Warning: Creating default object from empty value in /home/wpchamp/public_html/kalyan/hn/wp-content/themes/kalyan-hn-theme/functions/admin-hooks.php on line 160

मौन

हंमेशा सत्य बोलने से विचारों का व्यर्थ प्रयत्नों का अंत आता है और जीवन में मौन की अनुभूति होती है, परिणाम स्वरुप जीवन में शांति प्रवेश करती है । हकीकत में मौन और शांति वह अपना सहज स्वभाव है स्वरुप है ।

मृत्यु

जीते जीते खुद के जात के प्रति मर जाना मतलब कुदरत के साथ एक हो जाना । फिर शारीरिक मृत्यु का डर नहीं रहेगा ना ही उसका दुःख होगा । हकीकत में शरीर की मृत्यु वह मृत्यु ही नहीं । आसक्ति की मृत्यु वही सच्ची मृत्यु है ।

संबंध

हमारे खुद के साथ संबंध नहीं है,  इसलिए भय और दुःख लगता है और बोरियत होती है । सब इन्द्रियों का सहयोग मिले इसके लिए खुद के साथ संबंध हो वह जरुरी है । संबंध मतलब संतुलन, एकता समग्रता ।

समझ

किसी भी व्यक्ति का हमे चित्तलक्षी दृष्टि से उपयोग करना नहीं या करने देना नहीं । किसी से प्रभावित होना नही अथवा करना भी नहीं । यह समझ जागते होंगे तो आएगी औऱ जीवन में स्थिरता भी साथ में आएगी ।

वर्तमान

वर्तमान में हम दूसरों को सुनते नहीं, इसलिए हमारे में सहजता, सरलता, नम्रता आती नहीं । खंडित सुनने से हमारे में स्मृति का संचय होता है और फिर उसके ऊपर मंथन – चिंतन चलता रहता है । बस हमारा वर्तमान इसमें ही खर्च हो जाता है ।

समग्रता

समग्रता में जीना यही अपने जीवन का सार है । वही सच्चा ध्यान है, सच्चा शिक्षण है, सच्ची सेवा है, सच्ची आंतरिक यात्रा है । यह यात्रा पूरा जीवन चलती रहती है और परिणाम वशः हमारे में शक्ति, स्फुर्ति आती रहती है ।

विश्वास

विश्वास वही भगवान । अगर खुद के ऊपर विश्वास आए तो सभी के ऊपर विश्वास आएगा । अगर खुद के पर विश्वास नहीं होगा, तो किसी पर भ विश्वास नही होगा । विश्वास जगेगा तो सहजता आएगी, जीवन में रिधम (लय) आएगा । जीवन से गुजरते गुजरते विश्वास जन्म लेता है और वह क्षणिक नहीं […]

सजगता

सजग रहने का अगर हंमेशा ख्याल रखना पडता हो जीवन जीने में अवरोधरुप बनता है । पल पल मरना और जीना आ जाए तो जाग्रत ही रहे । हमारे में सहज रुप से शक्ति, विश्वास और मुक्ति भीतर से प्रकट होती है ।

प्रेम

प्रेम का नाम है देना, हंमेशा देना, सब कुछ देना । प्रेम में लेना होता ही नहीं और दो मतलब मिलेगा ही । यह कुदरती नियम है । प्रेम हंमेशा पूरक ही होता है । प्रेम की शाखा मतलब करुणा । अपार करुणा । प्रेम मतलब पारसमणि । देने से बढता ही जाता है ।

शोषण

स्वज्ञान के बिना जो कुछ भी करेंगे वह वास्तविक तौर पर हिंसा और शोषण को बढावा देगा । जैसे किसी का शोषण करना गलत है वैसे ही अपना शोषण करने देना भ अयोग्य है । आज समग्र जगत शोषण की तरफ झुक रहा है तभी अलिप्त और शोषण रहित कैसे जीए वह सीखें ।