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प्रेम

प्रेम का नाम है देना, हंमेशा देना, सब कुछ देना । प्रेम में लेना होता ही नहीं और दो मतलब मिलेगा ही । यह कुदरती नियम है । प्रेम हंमेशा पूरक ही होता है । प्रेम की शाखा मतलब करुणा । अपार करुणा । प्रेम मतलब पारसमणि । देने से बढता ही जाता है ।

प्रमाद लापरवाही

लापरवाही सूक्ष्म है, पकड में नहीं आती । हम अपने मानसिक प्रश्नों को हंमेशा धकेलते रहते हैं और उनमें से गुजरते नहीं । प्रश्नों, फरियादों को धकेलने से दिनों दिन वे बढते जाते हैं । हमारे प्रश्नों के मूल में प्रमाद (लापरवाही) है उसको पहचाने ।

आंतरिक क्रांति

आंतरिक क्रांति हुए बिना अखंड तरफ यात्रा की शुरुआत होती नहीं । हम ज्यादातर परंपरावशः बनकर गोलगोल चक्र में घूमते रहते हैं । हमारी उत्सुकता हो तो आंतरिक क्रांति क्षण में ही हो ।

आदत

आदत के साथ राग द्वेष करने से आदत मजबूत बन जातीहै । आदत मतलब द्वंद और द्वंद मतलब “मैं” । आदत को पोषण देने से “मैं” को पोषण मिलता है । रागद्वेष के बिना आदतों के सामने देखने से वह स्वयं झड जाती हैं ।

विचारक और विचार

विचारक और विचार एक हो जाए तो समय पिघल जाए । हकीकत में समय चित्तलक्षी है, मतलब कि हमारे मन की खडी की गई भ्रमणा है । समय के ऊपर आधार रखने से अपने जीवन में सुखशांति नहीं आती । हम या तो भूत काल के सुख दुःख को चिपके रहते हैं अथवा भविष्य के […]