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जीवन का सार

वर्तमान में ही रहना, वह सच्चा अध्यात्म है, ध्यान है, समझ है । यही अपने जीवन का सार है, नहीं तो सत्य को समझने की पूर्व तैयारीयाँ करते रहने से वर्तमान गलत ही खर्च होगा ।

संग्रह

संग्रह वही संघर्ष । यह विवेकपूर्वक समझना है । विवेकपूर्वक देखना वह ध्यान और समग्र भाव से देखना वह आचरण । नहीं तो हंमेशा के लिए स्वरुप से बहार रहकर, औपचारिकता में जीवन बीत जाएगा ।

फूल

एक ध्यान बनकर हमारे भीतर बैठी कलि को हम फूल तक खिलने देते नहीं, यह हमारी मुसीबत है । कारण यह है कि समग्र जीवन बेध्यान पने और शुष्क वैचारिकता में ही खर्च कर देत हैं और इसके बावजूद सुगंध की आशा रखते हैं ।

एकांत

हृदय की समझ (ऊगे) पनपे तो भरी भीड में एकांत का अनुभव हो, यह सच्चा ध्यान है । हकीकत में भरे भरे जगत में हम अकेले ही है इसके बावजूद बाहरी और आंतरिक तरीके से हंमेशा प्रतिक्रिया और प्रतिकार करते हैं इसलिए एकांत खो जाता है । भीतर के मौन के लिए एकातं अदभुत निवास […]

द्वंद्व

द्वंद्वों से पर गए बिना कभी स्वज्ञान होगा नहीं । अवगुणों को विरोधाभासी वृत्तियों को पोषण नहीं मिलने से धीरे धीरे वातावरण योग्य और स्थिर बनता जाता है । ऐसा अनुभव स्वरुप में रहने से होता है । भीतर में शांति और खामोशी भी जन्म लेती है ।

विचार

स्थिर और शांत बनकर दूसरों की बात सुनेंगे तो विचार शांति में ही समा जाएंगे । जैसे दरिया में लहरे उठकर समा जाती हैं ऐसा विचारों का भी है । हम तो जीवन ही विचारों में व्यतीत करते हैं मतलब विचार हमको जकडकर पराधीन बनाते हैं । गहरे उतरकर इतना ही विचार करें ।

लेखन

एकाग्र बनकर लिखने से ध्यान हो जाता है । यह लेखन सहज जीवन जीने से पनपता है । फिर जीना और लिखना यह दोनो पूरक बन जाते हैं । जीवन का संशोधन ऐसे रोज रोज चलता रहता है और यह संशोदन मुक्ति की तरफ ले जाता है ।

इनसान को इनसान का डर क्यो लगता है ?

इनसान एक दूसरे से घबराता है । इनसान इनसान से डरता रहता है । एक दूसरे से डर लगता है । यह सदमा पहुँचाए और नवीनता लगे, ऐसी यह सदी की घटना है, वास्तविकता है । क्योंकि इनसान नींद में जीता है । इनसान अतिशय लोभी और कृप्ण बना है । इसलिए एक दूसरे को […]