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मौन

हंमेशा सत्य बोलने से विचारों का व्यर्थ प्रयत्नों का अंत आता है और जीवन में मौन की अनुभूति होती है, परिणाम स्वरुप जीवन में शांति प्रवेश करती है । हकीकत में मौन और शांति वह अपना सहज स्वभाव है स्वरुप है ।

जीवन का सार

वर्तमान में ही रहना, वह सच्चा अध्यात्म है, ध्यान है, समझ है । यही अपने जीवन का सार है, नहीं तो सत्य को समझने की पूर्व तैयारीयाँ करते रहने से वर्तमान गलत ही खर्च होगा ।

सुनना ही सेवा

सत्य को सुनेंगे तो हमारे अदंर संवादिता आएगी और शीतलता की अनुभूति होगी इससे सुनना सच्ची सेवा बनी रहती है । सत्य को सुनेंगे तो निर्भर भी बनेंगे । बाद में जीवन में कोई व्यकित् या किसी बात का कोई भय नहीं लगेगा । सत्य और सेवा परस्पर जुडे हुए हैं, यह समझें ।

ज्ञात विसर्जन

सत्य हंमेशा निरपेक्ष होता है । पूरा जीवन हम ज्ञात में ही जीते हैं । उसके कारण विभाजन (भाग) पडने के और बुद्धि के तर्क की चर्चाएं चलती रहेंगे । जीवन व्याख्याओं में ही खोया रहेगा । ज्ञात और अज्ञात जिस पर जीवन है इसका अनुभव करेंगे तभ जीवन के सौंदर्य को पा सकेंगे ।

अंतरसूझ का अभाव

अपने संतोषके खातिर दूसरों का दोष निकालने से प्रश्न तथा फरियादें अपने जीवन में ज्यादा आती है । अंतरसूझ के अभाव में एक दूसरे के ऊपर सारा जीवन दरमियान निकालते रहते और सत्य तथा परमशांति से सदा वंचित रहते हैं ।

कीर्ति

कीर्ति या यश की आशा रखने से हम भीतर की परम शांति से वंचित रहते हैं और सत्य से भी दूर जाते हैं । ऐसी कीर्ति (या यश) या कडवाहट की आशा-इच्छा जीवन में अवरोध रुप बनती है ।

पढा लिखा इसके बावजूद अज्ञानी

जो इन्सान प्रश्नों और फरियादों से कभी ऊपर ही नहीं आता और खुद के सुख दुःख के लिए दूसरों को निमित्त बनाता है । वह पढा लिखा इसके बावजूद अज्ञानी है । हम सुख दुःख जैसे शब्दों को ज्यादा महत्व देते हैं । इसलिए ऊपरी जीवन जीते है और खुद के स्वरूप से दूर रहते […]