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हम मुक्त ही हैं ।

हम मुक्त ही हैं परंतु मानिसक तौर पर बेचैनी भरे प्रयत्न करने से मुक्त अवस्था को अनुभव को दूर करते हैं ।

पूरे जीवन के दौरान, मुक्ति कैसी सौम्य, शांत और परम आनंदपूर्ण है यह भीतर से अनुभव कर नहीं सकते ।

मुक्त होने के लिए जितने ज्यादा प्रयास करते हैं उतना ही मुक्त स्वरुप से दूर जाते हैं, यह हकीकत है सत्य है।

हम मुक्त होना ही नहीं चाहते और चाहें तो स्वतंत्र है । कोई रोक सके ऐसा नहीं है । यह अपने हात की बात है ।

संसार में अन्य चीजे पाने के लिए प्रयत्न करना पडता है, परंतू मुक्ति के लिए प्रयत्न करना पागलपन है । क्योंकि प्रयत्न यानि अपेक्षा, बदला फल की ईच्छा और यह प्रयत्न अपने स्वरुप, मुक्त अवस्था से अलग रखता है ।

बेहोशी में अत्यंत प्रयत्नशील रहने से हम दूसरे से अलग पड जाते हैं । एकता का अनुभव नहीं होता है ।

एकता के बिना मुक्ति संभव नहीं, इसलिए मुक्ति असंभव लगती है हकीकत में कुछ भी असंभव नहीं है। हमे सच्ची भूख हो, अति वयाकुलता हो प्रमाणिक इरादा हो हम तुरंत ही मुक्त है, ऐसे आंतरिक अनुभव होगा ।

हम शब्दो को जरुरत से ज्यादा महत्व देने के अधीन हो गए हैं । हम शब्दो को ही विवेक रहते हैं । दुःखी है यह मानते हैं इसलिए सुखी होने के प्रयत्न करते हैं, हिंसक है हम इसलिए अहिंसक बनने का प्रयत्न करते हैं ।

सम्पूर्ण जीवन ऐसे प्रयासो में ही वयतीत हो जाता है । भीतर खालीपन है और अज्ञानता का आवरण है इसलिए भौतिक सुखो को पाने के प्रयासो में शक्ति खर्च करते हैं ।

मुक्त न होने में या ऐसा अनुभव न करने में हम अपने आप ही जवाबदार है और अपने साथ अन्याय करते हैं । यह बात गहराई से समझे ।

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