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आधार का अंत, जीवन का आरंभ

मानसिक रूप से आधारो का अंत आते ही जीवन का आरंभ होता है और आंतरिक मुक्ति की तरफ अपनी गति होती है ।

यह अपने हाथ की ही बात है । हमको सच्ची भूख और व्याकुलता है तो मानसिक तौर पर सब आधारो के बिना, स्वतंत्र मुक्त जीवन जी सकते हैं ।

आलसीपना हमारा सबसे पहला बडा शत्रु है । इसलिए जीवन भर मुक्ति के मार्ग के लिए मुडते नहीं है । आलस के कारण हम जीवन बेहोशी और नींद में बिताते हैं । जागते ही नहीं . कोई उठाता है तो भी फिर सो जाते हैं । इसलिए कभी विचारशील नहीं होते ।

जीवन भर हम अपनी जीवन नौका दूसरे के आधार पर चलाते हैं । दूसरे के आधार पर जीवन जीने से हमारे अंदर भौतिक संवेदनशीलता और साहसिकता नहीं आती । हंमेशा अपाहिज रहते हैं । अपने ऊपर विश्वास होता ही नहीं . इसी वजह से हमारी जीवन भय और दूःख में वयतीत होता है ।

यह हमारी अज्ञानता है । हम अज्ञानी हैं इसकी जानकारी जीवनभर नहीं होती ।

दूसरे के ऊपर आधार रखने से मालिक टेका मिलता है ।फिर जीवन आधार लेकर जीने की आदत पड जाती है । आधार बिना बिलकुल अकेले पड जाते हैं और एक क्षण भी नहीं चलता सब स्थूल औऱ सूक्ष्म आधार हमारा शोषण करते हैं ब्लैक मेल (Black Mail) भी करते हैं । फिर हम भागते हैं । पहले एक रूप होकर फिर गेडू पहनकर – ऐसा होता है ।

आधारों का यह चक्र जीवन भर घूमते रहता है । समग्र तरह से इस बात को वर्तमान में देखे और सुने तो यह आधार छूट जाते हैं और सत्य के दर्शन की झाँकी के साथ मुक्त होने के मार्ग पर अपनी सहज गति होती है ।

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