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संगीतमय अखंड जीवन

हम व्याख्यान, भाषण कथाएं सब खंडित तरीके से सुनने में पूरा जीवन खर्च कर देते हैं ।

हम इस विषय में मनन-चिंतन करके खुद के भीतर का मार्ग ढूँढते नहीं इसलिए जीवन इसी के राग द्वेष और बोरियत के मार्ग पर चलता है ।

खंडितका अर्थ है सीमित दृष्टि, ऊपरी दृष्टि । जीवन और संसार के व्यवहार को अगर समग्र रूप से अखंड रुप से देखे और सुने तो जीवन की समग्रता में व्याख्यान, भाषण या कथाओं के शब्दो का ऊपरी,  नकली दोहराना चला जाता है । शब्दो का बंधन रहता नहीं और शब्द, वाणी सब भीतर की यात्रा के लिए साधन बन जाते हैं ।

हम शब्दों को चिपके रहते है इसलिए झूठी माथापच्ची और मंथन चलता रहता है और मौलिक संवेदनशीलता या विचारों को कोई स्कोप (Scope) नहीं मिलता।

मैं पना हंमेशां चिपका रहता है और दूसरा हाजिर हो जाता है । दूसरा हाजिर होने से बराबरी, विरोधाभास देखा देखी सुरु हो जाता है ।

मानसिक तौर पर मैं पना रहे मतलब तुलना आती है । अहम बढता है, शक्ति का व्यय होता है ।

यह बात हृदय से समझ में आए, वह ध्यान है । नहीं तो जीवन में पथ पथ पर दुःख ही दुःख है । भय है । असलामती है ।

अखंड देखने की दृष्टि खुले तो जीवन में कोई दुःख या भय रहे ही नहीं, फिर तो हम जीवन में फूल जैसे हलके और सुगंधित बनकर जी सकेंगे ।

संसार में समग्र दृष्टि रखे तो हलके फूल होकर पंछी के जैसे उड सकेंगे ।

समग्र जीवन का पल पल जीने जैसे लगेगा । जीवन संगीतमय बन जाता है – भौतिक सहुलतें है या नहीं, कुछ फरक नहीं पडता ।

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