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स्वज्ञान का अभाव वही अज्ञान

इनसान अगर जीवन की वास्तविकता और प्रश्नों से भागे नहीं तो और उसके साथ रहे तो स्वज्ञान हो ।

स्वज्ञान का अभाव यही बडा अज्ञान है । माहिती ज्ञान पंडिताई या बुद्धिचातुर्य चाहे जितना हो तब भ जीवन में काम आता नहीं, उलटा जीवन से दूर खिंच ले जाता है ।

स्वज्ञान जीवन में से बहुत सिखाता है । स्वज्ञान नहीं हो तो सबकुछ होने के बावजूद जोडकर खाली रहना । भय और दुःख रहेगा ही ।

स्वज्ञान मतलब खुद के विषय की समझ । खुद की पहले की समझ कठोसूझ खुद क्या करती है, क्यों करत है । बोलते चलते विवेक पनपता है, सजगता रहती है यह स्वज्ञान है ।

सजगता और विवेक हो तो जीवन में कोई प्रश्न या फरियाद रहे ही नहीं और किसी प्रकार से संघर्ष के बिना शांति से जीवन जीया जाए ।

सचमुच हकीकत में कोई प्रश्न होता ही नहीं । प्रश्न हम  खुद ही अज्ञानता के कारण खडे करते हैं । पूर्वग्रह या सुग जैसा कुछ होता ही नहीं । परंतु यह सब हम अपने गलत विचारों के कारण पैदा करते हैं ।

विचारों के साथ आसक्त नहीं होना । आसक्त होने से घडी में मजा, घडी में पीडा ऐसा पूरा जीवन बिताते हैं ।

अपनी अज्ञानता के कारण विचारों को हम पोषण-खोराक देते हैं ।

विचार हमको सत्य से, वास्तविकता से दूर ले जाता है । सत्य का दर्शन होता नहीं अथवा धुंधला बन जाता है । फिर हम बार बार चिल्लाते हैं और मंच सजाकर कहते है कि सत्य का दर्शन होता नहीं ।

सत्य की अनुभूति के लिए स्वज्ञान में रहना एक ही ऊपाय है ।

हमारी सच्ची भूख नहीं है । हमारा इरादा या नहीं है । हम जागते हैं ऐसे भ्रम में रहते हैं इसलिए स्वज्ञान की सुबह होती नहीं ।

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