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पढा लिखा इसके बावजूद अज्ञानी

जो इन्सान प्रश्नों और फरियादों से कभी ऊपर ही नहीं आता और खुद के सुख दुःख के लिए दूसरों को निमित्त बनाता है । वह पढा लिखा इसके बावजूद अज्ञानी है ।

हम सुख दुःख जैसे शब्दों को ज्यादा महत्व देते हैं । इसलिए ऊपरी जीवन जीते है और खुद के स्वरूप से दूर रहते हैं ।

हकीकत में सुख दुःख जैसा कुछ है ही नहीं, यह बात स्वरुप में रहने व गहराई में जाने से समझ में आती है । ऐसा अनुभव भी होता है ।

हम हंमेशा खुद से दूर रहकर खोज करते हैं । अलग रहकर खोज करने से मूल (जड) पकड में आता नहीं और बाहरी खोज चलती रहती है । परंतु आंतरिक खोज के लिए अपने खुद के बहुत करीब जाना पडता है और खुद के मन के साथ, विचारों के साथ आदर भाव और मित्रभाव से बर्ताव करना पडेगा ।

अंदर की खिडकी सहज प्रेम से खुलती है दमन-शमन से नहीं ।

हम और मन एक ही है, सत्य में कोई भेदभाव नहीं । परंतु हम मन से अलग रहकर उसे वश करने या उगाने के प्रयास करते हैं इसलिए खंडित बन जाते हैं ।

जानकारी का, ज्ञान का, जानने का कभी अंत आता नहीं । पढा लिखा इनसान ज्ञान का – जानकारी का भंडार होता है, परंतु ऐसा पढा हुआ हंमेशा सीमा रहित इच्छाओं से हंमेशा परेशान व घबराया हुआ होता है । क्योंकि ऐसे पढे हुए के मूल के साथ, भीतर के साथ कोई संबंध जोडता नहीं ।

पढा हुए भीतर खाली होता है । वह आदत के कारण जानकारीयाँ जमा करता जाता है जिसके कारण समग्र दर्शन होता नहीं ।

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