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जो मुक्त करे वह सच्चा शिक्षण

जन्म से मृत्यु तक हम हररोज नए तरीके से जीवन जीए तभी हमारे जीवन में शिक्षण का आरंभ होता है । यह शिक्षण का आरंभ होने के बाद उसका अंत आता नहीं और खूबी की बात है कि ऐसे स्वयं शिक्षण से हमारे जीवन में निरंतर स्फुर्ति रहती है ।

जीवन के ऊपर विश्वास आता है और विश्वास आने से जीवन स्वयं एक शिक्षण बन जाता है ।

जो मुक्त करे वह सच्चा शिक्षण, जीवन में योग्य तरीके से, प्रमाणिकता से सभी के साथ मित्र-प्रेमभाव से व्यवहार, कर्ता बने बिना करना उसे ही सच्चा शिक्षण कहलाता है ।

शिक्षण मतलब आनंद से किया गया तप । तप करना मतलब सबके साथ रागद्वेष बिना प्रेमभाव से जीवन जीना । गहराई से जीना, शांति से जीना, अपने खुद के तरीके से मौलिक रुप से जीना ।

जो आज का शिक्षण है वह हकीकत में केवल माहिती ज्ञान है, वह थियोरेटिकल है । इसका योग्य उपयोग है । परंतु उसी को महत्व देंगे तो उसका उपभोग कीया कहलाएगा । उसी को सर्वस्व मानने से अपने जीवन में वह अवरोध और परदा बन जाता है ।

आज के शिक्षण में चेतना का, संवेदनशीलता का या सर्जकता का स्पर्श नहीं है । ऐसा शिक्षण सच्चा शिक्षण नहीं कहलाता ।

शिक्षण मतब अखंडता, समग्रता और संतुलन ।

आज माहिती ज्ञान को, नोलेज (Knowledge) को हम शिक्षण कहते हैं, वह (बराबर) ठीक नहीं क्योंकि उसमें जीवन की शिक्षा प्रवेश नहीं करती ।

माहिती ज्ञान का ज्यादा वजन आने से का अंत आता है और हमको धीरे धीरे जडता की तरफ धक्का देता है । अंत में, जीवन में चेतना, स्फुर्ति के अंश की घटाई होती है ।

जीवन की यात्रा का आरंभ नित्य नूतन हो तो अंत तक ऐसी नित्य नूतनता जीए वह सच्चा शिक्षण ।

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