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अहम का खेल

हमारा “मैं” हंमेशा दूसरो के प्रभाव के नीचे जीता है इसलिए मैं को पोषण मिलता है और हमको सुखदुःख व भय के अनुभव होते रहते हैं । हकीकत में यह सब हमारे मन के अर्थात “मैं” का खेल है । नींद से जागे और आसक्त न हो तो सुख या दुःख जैसा कुछ होता ही नहीं ऐसा अनुभव में आता है ।

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