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द्वंद्व

द्वंद्वों से पर गए बिना कभी स्वज्ञान होगा नहीं । अवगुणों को विरोधाभासी वृत्तियों को पोषण नहीं मिलने से धीरे धीरे वातावरण योग्य और स्थिर बनता जाता है । ऐसा अनुभव स्वरुप में रहने से होता है । भीतर में शांति और खामोशी भी जन्म लेती है ।

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