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स्वयं की सेवा

दूसरों का उद्धार और सेवा करने के लिए हम प्रयत्न करते हैं उसमें कभी सच्ची मानसिक तृप्ति मिलती नहीं । इनसान पहले खुद की सेवा करे तो स्वरुप को देख सके । नहीं तो जीवन भर दूसरों की सेवा करने के बावजूद अंदर से अति गरीब और भिखारी ही रहेगा ।

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