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निवेदन (आत्म-परिचय)

मैं किसान परिवार की संतान हूँ । प्रभुभक्ति, आस्था के वातावरण में बडा हुआ हूँ । सातवी कक्षा तक मेरी पढ़ाई हुई है ।

अठारह वर्ष की उम्र मैं अपना गाँव संडेर (जि. मेहसाणा) छोड़कर बड़ोदा आया । थोड़े समय के लिए रिश्तेदार की दुकान चलाई । बाद में अपनी खुद की अनाज – किराणा की दुकान खोल दी । धंधे में नफाखोरी और लोभ प्रवृत्ति जगने के कारण आटे में और मुंगफली तेल में भेलसेल करके बेचना शुरु हुआ । कोर्पोरेशन के अधिकारी दुकान में से नमुने ले के गये और तपास शुरु हुई । हम लोग दोषित साबित हुए । मामला न्यायालय तक गया, हम अस्वस्थ हो गये, हृदय में पश्चाताप होने लगा ।

बाद में आचार्य रजनीश और जे. कृष्णमूर्ति के विचारों का परिचय हुआ । आध्यात्म की लगनी लगी । थियोसोफी सोसायटी में श्री रणछोडभाई पटेल का परिचय हुआ । उनके घर जाने से उनका प्रत्यक्ष सत्संग प्राप्त हुआ, मैं निर्भिक बन गया । आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने कोर्ट में गुन्हा कबुल कर दिया । जज साहब को मेरी सच्चाई छू गयी । इसीलिए उन्होंने मेरे वकील को बड़ी अदालत में अपील करने की सलाह दी । हम बड़ी अदालत में केस जीत गये । कोर्पोरेशन ने हायकोर्ट में अपील की है । सत्रह साल से केस चल रहा है । कुछ बी निर्णय आये, मैं समाज में रहू या जेल में । सभी स्थितियों में मैं मुक्त आत्मा हूँ, ऐसा मुझे दृढ़ एहेसास होता रहता है ।

ता. 2.5.84 की मध्यरात्री को मेरा नया जन्म हुआ । सुषुप्त अवस्था में मुझे तेजोप्रकाश का एहसास हुआ और उस क्षण से आजतक मैं एकदम अल्हाददायक बन गया हूँ। राग-द्वेष, चिंता-डर, क्रोध-लोभ जेसी दंद्वात्मक चित्त स्थिति अब नहीं रही । समरचना की दृष्टि से जीना शुरु किया है । सात्विक शांती की विचारधाराएँ सहज रूप से बहती रहती है ।

बंधुत्व भाव से सबके साथ रहना, मिलना जुलना यही मेरा जीवन है ।