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साधन ही साध्य है

सत्य समझने के लिए कोई साधना या पद्धति या तरीका भी नहीं है । साधन ही साध्य है । साधना को यादा महत्व देने से अतवा एकरूप होने से वह सत्य को समझने में बाधा रुप बनता है और फिर किया करे बिना हीं चलता । इसके विषय में जरा भी विचारशील नहीं होते। हमारे […]

सूक्ष्म शोषण और हिंसा

शरीर और मन को एक साधन के तरह से अघर जीवन में न संभाले तो हम अपने आप का शोषण करते रहेंगे। शरीर-मन के साथ मित्रभाव रखते हुए, आदरपूर्वक समझकर इसे संभालना है । यह दोनों (शरीर एवं मन) अच्छा जीवन के दरमियान बराबर सहयोग दें यह देखना है । यह समझ होना अपना विवेक […]

सूक्ष्म हिंसा

सत्य को समझने के लिए हम मानसिक तौर पर प्रयास करते है इसलिए अपने आप से दूर रहते है । अपने अंदर सूक्ष्म हिंसा चलती रहती है । तुलना करने से, पूर्व तैयारी करने से, प्रयत्न करने से पूर्व अनुमान रखने से “मैं” अपना अहंकार होता है । सूक्ष्म हिंसा से भी अचेतना आती है […]

किसी का उपयोग करने से पहले विचार जरूरी

अपने स्वार्थ व संतोष के खातिर दूसरो का उपयोग या उपभोग करने से अपनी मूल (मौलिक) विचारशीलता छूट जाती है । हम अपनी हंमेशा सलामती और दूसरे के आधार पर जीवन जीने आधीन हो गए हैं । इसलिए निरंतर अन्य व्यक्तियो व उनके विचारों का उपयोग करते है । बहारी सलामती में जीने से भय […]

असंतोष से ही संतोष का प्रवेशद्वार

हम सबको अनुभव है कि हमारे जीवन में या वो हंमेशा या आनेजाने वाला संतोष आता है । हम असंतोष को दबा देते हैं या खत्म कर देते हैं । परंतु हम उसकी (असंतोष) की तरफ पूरा ध्यान देंगे तो असंतोष से संतोष की तरफ अपने जीवन की गति होती है । इसके लिए हमारे […]

तर्क यानि उलझना

हम बुद्धी का ज्यादातर उपयोग तर्क तथा दलील (बहसबाजी) करने में करते हैं । इससे हम अपने मूल स्वभाव और स्वरूप से अलग पड जाते हैं । अपना आत्मरक्षण और अपने साथ लिका छुप्पी खेलने में बुद्धी का उपयोग करने से बुद्धी हमको जात जात के खेल खिलाती है । औऱ बाद में हमको बी […]

केवल होना या कुछ बनना

हम सभी आंतिरकरूप से एक है पर मानसिक तौर से कुछ कुछ बनने के प्रयत्न करने से अपने स्वरुप से अलग रहते है । यह हमारे जीवन की नासमझी है । हम जीवनभर कुछ बनने का, कुछ पाने का प्रबल इच्छा रहती है । इसके लिए जीवनभर प्रयास करते रहते हैं । और इसका अंत […]

स्वभाव में रहना ही सच्ची अध्यामिकता

अपने स्वभाव में रहना ही सच्ची अध्यामिकता कहलाती है । क्योंकि स्वभाव में रहनेसे पुनर्र जीवन होता है । जीवन संगीतमय बनता है । यह हमारे समग्र जीवन का सार है । स्वभाव में रहना यानी स्वरूप में रहना और समग्रता में जीना । यह सच्चा जीना है बाकी केवल योनिक जीवन है। यह भक्ति […]

आधार का अंत, जीवन का आरंभ

मानसिक रूप से आधारो का अंत आते ही जीवन का आरंभ होता है और आंतरिक मुक्ति की तरफ अपनी गति होती है । यह अपने हाथ की ही बात है । हमको सच्ची भूख और व्याकुलता है तो मानसिक तौर पर सब आधारो के बिना, स्वतंत्र मुक्त जीवन जी सकते हैं । आलसीपना हमारा सबसे […]

हम मुक्त ही हैं ।

हम मुक्त ही हैं परंतु मानिसक तौर पर बेचैनी भरे प्रयत्न करने से मुक्त अवस्था को अनुभव को दूर करते हैं । पूरे जीवन के दौरान, मुक्ति कैसी सौम्य, शांत और परम आनंदपूर्ण है यह भीतर से अनुभव कर नहीं सकते । मुक्त होने के लिए जितने ज्यादा प्रयास करते हैं उतना ही मुक्त स्वरुप […]