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संग्रह

संग्रह वही संघर्ष । यह विवेकपूर्वक समझना है । विवेकपूर्वक देखना वह ध्यान और समग्र भाव से देखना वह आचरण । नहीं तो हंमेशा के लिए स्वरुप से बहार रहकर, औपचारिकता में जीवन बीत जाएगा ।

आचरण

हम चाहे जितने बडे विद्धवान हों परंतु जीवन में आचरण नहीं हो तो प्रश्न और फरियादें रहेंगी ही । वर्तमान में समग्र भाव से देखें और सुने तो योग्य आचरण स्वयं होता रहेगा । हकीकत में आचरण स्वज्ञान से अमल में लाया जाता है ।