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Tag Archives: प्रेम

प्रेम

प्रेम का नाम है देना, हंमेशा देना, सब कुछ देना । प्रेम में लेना होता ही नहीं और दो मतलब मिलेगा ही । यह कुदरती नियम है । प्रेम हंमेशा पूरक ही होता है । प्रेम की शाखा मतलब करुणा । अपार करुणा । प्रेम मतलब पारसमणि । देने से बढता ही जाता है ।

त्याग

त्याग करना पडे वह त्याग नहीं है । त्याग सहज रूप से हो जाता है । दूसरों की मदद या सहयोग करते समय उसका ख्याल हंमेशा रहे तो अलग हो जाएंगे । क्योंकि आंतरिक रुप से सहायता करनेवाला महत्व का रहता है । यह बात को समग्र भाव से देखेंगे तो त्याग का मूल प्रेम […]

ईश्वर का साक्षात्कार

आत्मा ही परमात्मा, ईश्वर की खोज बहार चलती है वहाँ तक प्रयत्न, प्रश्न और निष्फलता (विफलता) का लगाव रहेगा । आत्मा और परमात्मा एक ही है अविभाजित है । निरंतर प्रेम और करुणा बहे वही ईश्वर का साक्षात्कार ।