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संबंध

हमारे खुद के साथ संबंध नहीं है,  इसलिए भय और दुःख लगता है और बोरियत होती है । सब इन्द्रियों का सहयोग मिले इसके लिए खुद के साथ संबंध हो वह जरुरी है । संबंध मतलब संतुलन, एकता समग्रता ।

आरंभ

जीवन जीने का आरंभ सचमुच भय और संघर्ष से मुक्त होने पर ही होता है । परस्पर एक दूसरे के आधार के ऊपर हमे जीने की आदत पड गई है । इसलिए भय और संघर्ष जन्म लेता है । यह बात को समग्र भाव से देखने से आधार का अंत आएगा और जीवन का आरंभ […]

सुनना ही सेवा

सत्य को सुनेंगे तो हमारे अदंर संवादिता आएगी और शीतलता की अनुभूति होगी इससे सुनना सच्ची सेवा बनी रहती है । सत्य को सुनेंगे तो निर्भर भी बनेंगे । बाद में जीवन में कोई व्यकित् या किसी बात का कोई भय नहीं लगेगा । सत्य और सेवा परस्पर जुडे हुए हैं, यह समझें ।

भय

असलामती का भय वह बडे से बडा भय है । शारीरिक सलामती का योग्य महत्व है । परंतु हम मन से सलामती ढूँढते हैं तब ज्यादा असलामत होते हैं । हकीकत में सलामती या असलामती बाह्य है शब्द है, द्वंद्व है यह समझ खिलेगी तो भय हंमेशा के लिए दूर होगा ।

अहम का खेल

हमारा “मैं” हंमेशा दूसरो के प्रभाव के नीचे जीता है इसलिए मैं को पोषण मिलता है और हमको सुखदुःख व भय के अनुभव होते रहते हैं । हकीकत में यह सब हमारे मन के अर्थात “मैं” का खेल है । नींद से जागे और आसक्त न हो तो सुख या दुःख जैसा कुछ होता ही […]

विचारक और विचार

विचारक और विचार एक हो जाए तो समय पिघल जाए । हकीकत में समय चित्तलक्षी है, मतलब कि हमारे मन की खडी की गई भ्रमणा है । समय के ऊपर आधार रखने से अपने जीवन में सुखशांति नहीं आती । हम या तो भूत काल के सुख दुःख को चिपके रहते हैं अथवा भविष्य के […]