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सजगता

सजग रहने का अगर हंमेशा ख्याल रखना पडता हो जीवन जीने में अवरोधरुप बनता है । पल पल मरना और जीना आ जाए तो जाग्रत ही रहे । हमारे में सहज रुप से शक्ति, विश्वास और मुक्ति भीतर से प्रकट होती है ।

आधार

हम संपूर्ण रुप से देखें और सुने तो अपने जीवन में मानसिक आधार, आशाएं, इच्छाओं का स्वयं अंत आता है और मुक्ति की अनुभूति होती है । हकीकत में हम सदा अखंड ही है परंतु खंडित जीवन जीने के आदि हो गए हैं, इसलिए आधार ढूँढते है ।

सच्ची मुक्ति

हम अगर जागते हो तो अपना स्वभाव स्वरुप हलकेफूल जैसा बना रहता है और जीवन में सौंदर्य के साथ आनंद खिल उठता है । यही सच्ची मुक्ति है, स्वतंत्रता है और इसमें ही हमारा गौरव है ।

हताशा

जीवन में हताशा, निराशा का लगाव क्यों जन्म लेता है ? इसका कारण हमारी ज्यादा स्वलक्षी प्रवृत्तियाँ हैं । निरंतर बाह्य जीवन जीकर भौतिकता में ही रस लेते हैं, परिणामवश आंतरिक शांति और मुक्ति के अनुभव से वंचित रहते हैं ।

लेखन

एकाग्र बनकर लिखने से ध्यान हो जाता है । यह लेखन सहज जीवन जीने से पनपता है । फिर जीना और लिखना यह दोनो पूरक बन जाते हैं । जीवन का संशोधन ऐसे रोज रोज चलता रहता है और यह संशोदन मुक्ति की तरफ ले जाता है ।

फिलसूफी त्यागें, जीवनको अपनाएं

हमारी चेतना मुक्त है । यह सत्य अगर हमको देखना और सुनना आए तो अभी, आज से ही आरंभ होगा नहीं तो किसी (कोई) दिन नहीं होगा । आरंभ करेंगे तो समझ में आएगा कि हमको किसी के आधार या किसी के संग की – कंपनी की जरूरत रहती नहीं । क्योंकि यह सब चित्तलक्षी […]

आधार का अंत, जीवन का आरंभ

मानसिक रूप से आधारो का अंत आते ही जीवन का आरंभ होता है और आंतरिक मुक्ति की तरफ अपनी गति होती है । यह अपने हाथ की ही बात है । हमको सच्ची भूख और व्याकुलता है तो मानसिक तौर पर सब आधारो के बिना, स्वतंत्र मुक्त जीवन जी सकते हैं । आलसीपना हमारा सबसे […]

हम मुक्त ही हैं ।

हम मुक्त ही हैं परंतु मानिसक तौर पर बेचैनी भरे प्रयत्न करने से मुक्त अवस्था को अनुभव को दूर करते हैं । पूरे जीवन के दौरान, मुक्ति कैसी सौम्य, शांत और परम आनंदपूर्ण है यह भीतर से अनुभव कर नहीं सकते । मुक्त होने के लिए जितने ज्यादा प्रयास करते हैं उतना ही मुक्त स्वरुप […]