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वर्तमान

वर्तमान में हम दूसरों को सुनते नहीं, इसलिए हमारे में सहजता, सरलता, नम्रता आती नहीं । खंडित सुनने से हमारे में स्मृति का संचय होता है और फिर उसके ऊपर मंथन – चिंतन चलता रहता है । बस हमारा वर्तमान इसमें ही खर्च हो जाता है ।

जीवन का सार

वर्तमान में ही रहना, वह सच्चा अध्यात्म है, ध्यान है, समझ है । यही अपने जीवन का सार है, नहीं तो सत्य को समझने की पूर्व तैयारीयाँ करते रहने से वर्तमान गलत ही खर्च होगा ।

आयोजन

जीने के लिए पूर्व तैयारी या आयोजन नहीं होता । वर्तमान के क्षण में स्थिरता से और पूरी सजगता से जीए तभी आयोजन स्वयं होता रहेगा । जैसे कोई नट रस्सी के ऊपर चलने से पहले कोई आयोजन करता नहीं, ऐसा ही जीवन को समझना ।

आचरण

हम चाहे जितने बडे विद्धवान हों परंतु जीवन में आचरण नहीं हो तो प्रश्न और फरियादें रहेंगी ही । वर्तमान में समग्र भाव से देखें और सुने तो योग्य आचरण स्वयं होता रहेगा । हकीकत में आचरण स्वज्ञान से अमल में लाया जाता है ।

विचारक और विचार

विचारक और विचार एक हो जाए तो समय पिघल जाए । हकीकत में समय चित्तलक्षी है, मतलब कि हमारे मन की खडी की गई भ्रमणा है । समय के ऊपर आधार रखने से अपने जीवन में सुखशांति नहीं आती । हम या तो भूत काल के सुख दुःख को चिपके रहते हैं अथवा भविष्य के […]

आधार का अंत, जीवन का आरंभ

मानसिक रूप से आधारो का अंत आते ही जीवन का आरंभ होता है और आंतरिक मुक्ति की तरफ अपनी गति होती है । यह अपने हाथ की ही बात है । हमको सच्ची भूख और व्याकुलता है तो मानसिक तौर पर सब आधारो के बिना, स्वतंत्र मुक्त जीवन जी सकते हैं । आलसीपना हमारा सबसे […]