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Tag Archives: शांति

मौन

हंमेशा सत्य बोलने से विचारों का व्यर्थ प्रयत्नों का अंत आता है और जीवन में मौन की अनुभूति होती है, परिणाम स्वरुप जीवन में शांति प्रवेश करती है । हकीकत में मौन और शांति वह अपना सहज स्वभाव है स्वरुप है ।

सलामती

समझ ही सलामती । इसके सिवा यह जगत में शांति या सलामती जैसा कुछ भी नहीं । हमारे अंदर अगर शांति होगी तो बहार भी शांति का अनुभव होगा । शांति और सलामती की खोज बाहर करेंगे तो उसका अंत आएगा नहीं, पूरा जीवन खर्च हो जाएगा ।

कर्ता भोक्ता

हम कर्ता भोक्ता रहते है इसलिए पूरा जीवन खंडो में व्यतीत होता है । सचमुच तो जीवन अखंड है परंतु हम उसे खंडो में बाँटे बिना जी नहीं सकते, इसलिए मानसिक शांति या आनंद अनुभव नहीं कर सकते । समग्र-अखंड दर्शन करेंगे तो यह बात समझ में आएगी ।

प्रतिकार

प्रतिकार करने से हम अपने आप से अलग पड जाते हैं । प्रतिकार के कारण संवेदनशीलता खो देते हैं और संवेदनशीलता बगैर हृदय की समझ या परम शांति की अनुभूति संभव नहीं । प्रतिकार का अंत आए तभी जीवन का आरंभ हो ।

द्वंद्व

द्वंद्वों से पर गए बिना कभी स्वज्ञान होगा नहीं । अवगुणों को विरोधाभासी वृत्तियों को पोषण नहीं मिलने से धीरे धीरे वातावरण योग्य और स्थिर बनता जाता है । ऐसा अनुभव स्वरुप में रहने से होता है । भीतर में शांति और खामोशी भी जन्म लेती है ।

हताशा

जीवन में हताशा, निराशा का लगाव क्यों जन्म लेता है ? इसका कारण हमारी ज्यादा स्वलक्षी प्रवृत्तियाँ हैं । निरंतर बाह्य जीवन जीकर भौतिकता में ही रस लेते हैं, परिणामवश आंतरिक शांति और मुक्ति के अनुभव से वंचित रहते हैं ।

विचार

स्थिर और शांत बनकर दूसरों की बात सुनेंगे तो विचार शांति में ही समा जाएंगे । जैसे दरिया में लहरे उठकर समा जाती हैं ऐसा विचारों का भी है । हम तो जीवन ही विचारों में व्यतीत करते हैं मतलब विचार हमको जकडकर पराधीन बनाते हैं । गहरे उतरकर इतना ही विचार करें ।

सत्य की यात्रा

सत्य की यात्रा हर एक को व्यक्तिगत करनी होती है । अपने खुद के सुख शांति के लिए, अपने ही लाभ और कल्याण के लिए जीवन में से और जीवन के अटपट व्यवहारों से प्रमाणिक तरीके से गुजरना है । समझकर मौन रहना यह विवेक है और विवेक से पूर्ण जीवन सहज रुप से गुजरता […]