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संबंध

हमारे खुद के साथ संबंध नहीं है,  इसलिए भय और दुःख लगता है और बोरियत होती है । सब इन्द्रियों का सहयोग मिले इसके लिए खुद के साथ संबंध हो वह जरुरी है । संबंध मतलब संतुलन, एकता समग्रता ।

मंथन

जीवन के अंत तक विचार मंथन क्यों चलता रहता है यह हमने कभी शांत चित्त से विचार नहीं करते । समझपूर्वक का और हृदयपूर्वक का संबंध हम दूसरों के साथ जोड सके तो एकता की अनुभूति होगी और मंथन के चक्र में से बाहर आ जाएंगे ।

कर्ता-भोक्ता न बने

हमारे पास धन हो ज्ञान हो परंतु उसके कर्ता-भोक्ता न बने तो अपने जीवन में सहजता और स्वभाविकता आए और फिर अपने खुद के साथ सच्चा संबंध होता है । संबंध मतलब एकता । कर्ता-भोक्ता बनने से हम अज्ञान वशः एक दूसरे को दुःखी करते हैं | एक दूसरे का जाने अनजाने में शोषण होता है । […]