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अनुकरण

जीवन में ज्यादातर हम दूसरों का अनुकरण (नकल) करते होते हैं । हमारे पास इतनी सामान्य समझ भी नहीं है कि अनुकरण से जडता आती है । अनुकरण से अपनी मौलिकता और संवेदनशीलता मृतः प्राय बनती है ।

संवेदनशीलता

तुम कभी निरीक्षण करते हो तब बेध्यानपने में ज्यादा बोलबोल करते हैं, या खाते रहतेहै बाद में उसका पश्चाताप भी बेध्यानपने में करते होते हैं ? ऐसे जडता में जीवन जीते है और संवेदनशीलता आती नहीं । बाद में सब रोग अपने ऊपर चढ बैठते हैं ।