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संशोधन

जीवन जीते जीते ही संशोधन होता रहता है । यह संशोधन आसक्त हुए बिना हो तो जीवन की खूबियाँ और रहस्य हमारी समझ में खुलते हैं । संशोधन का अंत आए तो जीवन कहाँ जड बन जाए या खंडित हो जाए ।

लेखन

एकाग्र बनकर लिखने से ध्यान हो जाता है । यह लेखन सहज जीवन जीने से पनपता है । फिर जीना और लिखना यह दोनो पूरक बन जाते हैं । जीवन का संशोधन ऐसे रोज रोज चलता रहता है और यह संशोदन मुक्ति की तरफ ले जाता है ।