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समग्रता

समग्रता में जीना यही अपने जीवन का सार है । वही सच्चा ध्यान है, सच्चा शिक्षण है, सच्ची सेवा है, सच्ची आंतरिक यात्रा है । यह यात्रा पूरा जीवन चलती रहती है और परिणाम वशः हमारे में शक्ति, स्फुर्ति आती रहती है ।

स्वयं की सेवा

दूसरों का उद्धार और सेवा करने के लिए हम प्रयत्न करते हैं उसमें कभी सच्ची मानसिक तृप्ति मिलती नहीं । इनसान पहले खुद की सेवा करे तो स्वरुप को देख सके । नहीं तो जीवन भर दूसरों की सेवा करने के बावजूद अंदर से अति गरीब और भिखारी ही रहेगा ।

सुनना ही सेवा

सत्य को सुनेंगे तो हमारे अदंर संवादिता आएगी और शीतलता की अनुभूति होगी इससे सुनना सच्ची सेवा बनी रहती है । सत्य को सुनेंगे तो निर्भर भी बनेंगे । बाद में जीवन में कोई व्यकित् या किसी बात का कोई भय नहीं लगेगा । सत्य और सेवा परस्पर जुडे हुए हैं, यह समझें ।